Thursday, 19 April 2012

राईट टू एजुकेशन का सच


राईट टू एजुकेशन का सच  शिक्षा के अधिकार का कानून 
आँकड़े बताते हैं
वर्ष
जनसंख्या
करोड़
नामांकन
करोड़
नामांकन
प्रतिशत
कक्षा10
1980
68
9.2
13.6%
34.3%
1990
91
13.2
14.6%
33.6%
2006
111
18.4
16.5%
35.5%
2011
119
20.8
17.4%
36.7%
कारण स्पष्ट है कि निम्न वर्ग के लोगों के लिये आज की शिक्षा आजीविका (रोज़ी रोटी) की व्यवस्था नहीं करती है। इसीलिये वह स्कूल छोड़ देते हैं।
अधिकांश भारत की जनसंख्या आज शिक्षा को आजीविका से जोड़ कर देखती है।   
आज जब भारत में 46% लोग कृषी आधारित व्यवसाय करते हैं और 22% विभिन्न स्वरोज़गार में रत हैं एवं 16% घरेलू कार्यों मे लगे हुए हैं तो क्या पाठयक्रम में बदलाव की आवश्यकता नहीं है ? क्योंकि केवल 16% व्यक्तियों के काम में आज की शिक्षा आ रही है  
आज भारत में 22% अनपढ 69% माध्यमिक कक्षा तक और 9% स्नातक या स्नाकोत्तर कक्षा तक पढे हैं, जबकि 73% स्नातक कला संकाय से हैं।  
सम्पूर्ण विश्व में लगभग 95% व्यक्ति 15 से 35 उम्र के गैर पारम्परिक शिक्षा प्राप्त करते हैं जिसमें बढईगिरी, मोचीगिरी, विद्युत कर्मी, पानीकर्मी, रसोईया, इत्यादि शामिल हैं। इस शिक्षा से उनकी आजीविका भी चलती है और उन्हें अपने ज्ञान को जीवन में उपयोग में लाने में भी सफ़लता मिलती है फ़लस्वरूप उनकी इस शिक्षा में रुची बनी रहती है

भारत में इस क्षेत्र में काफ़ी रोज़गार के अवसर होने के बावजूद भी लगभग 2% लोग इस प्रकार की औपचरिक शिक्षा प्राप्त करते हैं परिणाम स्वरूप देश के तकनीकि कारीगरों का स्तर गिर गया जिससे न तो वह कारीगर अपनी आजीविका का और न ही अपने ज्ञान का स्तर बढा पाता है, क्योंकि वह भारत के औद्योगिक क्षेत्र के काम का नहीं है।                 
भारत सरकार ने इस बजट मे 74056 करोड़ स्कूली शिक्षा के लिये रखा है तो क्या यह आपके कर के धन का सद्उपयोग है ? 

1 comment:

  1. एजुकेशन के नाम पर हमारे यहाँ सिर्फ़ खानापूर्ति हो रही है...........हमारे यहाँ का सिस्टम बेरोज़गारी को बढ़ावा देता है, ना तो ये रोजगारपरक है, ना व्यहवारपरख...........बस लालफीतशाई है

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