ईन्डिया
अगेन्स्ट करप्शन: आज के इस परिवेष में हम लोगों ने यह लगभग यह मान लिया है कि कोई
भी सरकारी कार्य बिना भ्रष्टाचार के नहीं हो सकता है, क्या यह हमेशा से ऐसे ही था?
यह कब से शुरु हुआ? क्या हम कुछ बदलाव ला सकते हैं ? क्या हमें इसे स्वीकार करना
ही पडेगा? क्या हम कुछ भी कर सकते हैं? ऐसे ही कितने प्रश्न आज के भारतीय के पास
हैं। वह शायद इस भ्रष्टाचार के इतिहास पर या इसके जन्म पर वह न विचारता हो परन्तु
अधिकान्श भारतीयों के मन में यह विचार तो है कि इस प्रकार के भ्रष्ट तन्त्र को मान
लेने कि अतिरिक्त क्या मेरे पास कोई विकल्प है??
आंकडे
बताते हैं कि इस भारत में लगभग 50% केवल रिशवत देते हैं। लगभग 30% भारतीय ऐसे हैं
जो रिश्वत ले कर के अपने उपर के अधिकारियों को अपना हिस्सा काट कर दे देते हैं। वे
लोग शायद ऐसा कर के बहुत प्रसन्न न भी हों तो भी उन्होंने इस प्रकार के भ्रष्ट
तन्त्र को स्वीकार कर लिया है। 10% ऐसे भी हैं जो शायद इस भ्रष्ट तन्त्र का
मान्सिक विरोध विरोध तो करते हैं परन्तु शायद विरोध के दुश्प्रभाव के भय से इसको
स्वीकार कर लेते हैं । बाकी 10% ऐसे जो इस भ्रष्ट तन्त्र को प्रसन्नता से स्वीकार
करते है। कदाचित यही वो भारतीय लोग हैं जो आज इस भ्रष्ट तन्त्र के संगरक्शक कहे जा
सकते है
जन
लोक पाल बिल : जब अन्तिम दो प्रश्नों (क्या हमें इसे स्वीकार करना ही पडेगा? क्या
हम कुछ भी कर सकते हैं?) का उत्तर नकारात्मक आया। तब कुछ बुद्धिजीवियों ने इस पर
विचार किया। और एक समाधान प्राप्त करने कि लिये, जो इस भ्रष्टतन्त्र के शिकार और
इसको चलाने वालों से इसकी चर्चा की गयी। भारत के हर वर्ग और हर क्षेत्र के लोगों
ने इस पर सुझाव दिये। इस कार्य में समस्त भारत के बुद्धिजीवियों का योगदान रहा।
समस्त सुझावों का समायोजन करते हुये एक व्यापक बिल क गठन किय गया। जब इसे कागज़ पर
उतार गया तो इसका नाम रखा गया जन लोकपाल बिल। आज भी इस लोकपाल बिल में सुझावों को
आमन्त्रित किया जाता है। समस्त भारत का कोई भी व्यक्ति इसमें अपना सुझाव दे सकता
है।
राजनीतिक
स्थिति: हम सब ने देखा कि इस सत्र में सरकार और विरोधी पार्टियों ने जनलोकपाल बिल
के साथ कैसा व्यवहार किया। किसी भी राजनीतिक पार्टि ने इसका समर्थन नहीं किया। कोइ
भी पार्टि इसका अपवाद नहीं है। कारण स्पाष्ट है कि यही वो राजनीतिक लोग हैं
जिन्हें इस भ्रष्टतन्त्र का लाभ होता है और निजी स्वार्थ के चलते वो इसे पास नहीं
करने चाहते हैं
सामाजिक
स्थिति: इसके विपरीत विभिन्न सर्वे से ये पता चलता है कि 80% भारतीय इस भ्रष्टाचार
विरोधि बिल का स्वागत करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस बिल के प्रावधानों को
पूर्ण रूप से नहीं मानते, परन्तु भ्रष्टाचार विरोधि नीतियों का पूर्ण समर्थन करते
हैं। इस प्रकार के लोगों को अपने सुझाव देने के लिये फ़िर से आमन्त्रित किया जाता
है।
नोएडा
का आन्दोलन पर प्रभाव: नोएडा का भौगोलिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण स्थान पर है। आज
की भारत की राजधानी के समीप यह एक ऐसा स्थान जो औद्योगिक, व्यापारिक और रिहायिशी
दृष्टि से प्रगतिशील क्षेत्र है। यहां पर हर वर्ग के लोगों क आगमन हो रहा है। इसी
कारण से नोएडा भारत के उन क्षेत्रों मे मान जाता है जहां पर भ्रष्टाचार चरम सीमा
पर है। यहाम के लोगों का यथोचित योगदान सान्दोलन को नया आयाम दे सकता है क्योंकि
यहां के लोग इस भ्रष्ट्तन्त्र को ठीक प्रकार से जानते है। दूसरे यह राजधानी के
निकटवर्ती क्षेत्र मे है।
नोएडा
के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र मे प्रभाव: राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्र मे होने के
कारण यहां का भ्रष्टतन्त्र कई गुना ज़्याद है। इसी कारण से यहां पर दुश्प्रभाव भी
अधिक है। इस बात को पुराने बाशिन्दे (लोग) बखूबी जानते हैं। जो नया व्यापारिक या
औद्योगिक इकाई यहां पर आ रही है वह इस क्षेत्र कि प्रगति को यहां के माल या
शापिन्ग काम्प्लेक्स से आंकति है जो शायद ठीक थाक लगति है। परन्तु जैसे हि कोई
किसी भी सेक्टर या नांव मे प्रवेश करता है तो यह्ह क जीवन भ्रष्ट तन्त्र के कारण
ठप्प दिखायी देता है। ग्रामीणों को अपनी ज़मीन कौडियों के भाव बेचनी पड जाति है जो
उसकी रोज़ी रोटी का ज़रिया है। और लगभग 70% नोएडा नांव मे ही है।
जहां
तक यहां पर बने भारत के रक्षा मन्त्रालय (वायु सेना, थल सेना और जल सेना) के लोगों
की बात की जाये तो अधिकांश यहां पर सेवा निवृत्त लोगों कि बहुतायत है, जो अपना
जीवन यापन पेंशन से करते हैं। उन लोगों का भी इस भ्रष्ट तन्त्र में जीना बहुत कठिन
हो चुका है

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